सपनों की उड़ान

ट्रेन अपनी रफ्तार पकड़ चुकी थी, अब तो शहर भी आंखो से ओझल होता जा रहा था..
वह सीट के एकदम कोने मे खिड़की पास दुबकी बैठी थी कई बार तो ऐसा लगा कि किनारे से ऐसा धक्का आएगा और वह खिड़की तोड़ बाहर चली जाएगी। सहमी सहमी नज़रों से वह सबको देखे जा रही थी, हर चेहरा उसके लिए अजनबी था और वह सबके लिए।

खिड़की से झांक कर जब उसने बाहर देखा तो अब उसका शहर बहुत पीछे छुट चुका था और सबकुछ उसके लिए अजनबी था। गणित से तो वह बहुत दूर भागती थी... लेकिन फिर भी उसने हिसाब लगाना शुरु किया। चालीस रुपए उसने शर्मा जी के घर की मेज़ से उठाए थे, पांच रुपए उसे सड़क पर पड़े मिले थे, पंद्रह रुपए दादी के चुराए थे और चालीस रुपए उसने मां के बटुए से निकाले थे। कुल मिलाकर हुए 100 रुपए। उसने सारे पैसे जमा किए और वह किताब उठाई जो उसे गौरी मौसी की बेटी ने दी थी, एक छोटे से फटे दुपट्टे में बांध निकल पड़ी अपने सपनों की दुनिया देखने।

घर में मां ने कभी उसे वह किताब पढनें ही नहीं दिया था..जब भी वह लेकर बैठती मां छीन कर कोई काम बता देतीं..आंगनबाड़ी में जाती तो थी लेकिन वहां भी मौका नहीं मिलता था,,इसी लिए उसने सोचा यहां से कहीं दूर जाकर सुकुन से पढ़ा जाए..

उसको ट्रेन में सफर करने का बहुत शौक था, वैसे तो उसने कई बार ट्रेन में पानी बेचा था, कुछ कुछ दूर का सफर भी किया था लेकिन टिकट लेकर खिड़की वाली सीट पर बैठने का मज़ा ही कुछ और होता है। खिड़की से बाहर झांक कर दुनिया को देखने का अलग ही एहसास होता है, दुनिया भी बिल्कुल खुशनुमा दिखाई पड़ती है बिल्कुल मासूम सपनों की तरह।

ट्रेन रुकी कुछ लोग उतरे, कुछ लोग चढ़े, उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे, आखिरकार उसका स्टेशन आ गया वह स्टेशन जहां तक का उसने टिकट लिया था। वैसे तो उस शहर के बारे में उसे दूर दूर तक कुछ नहीं मालूम था बस आगे वाली आण्टी के मुंह से नाम सुन उसने भी वहीं का टिकट खरीद लिया और चल दी सपनों की उड़ान भरने..

चारों तरफ नज़र दौड़ाई  तो सब कुछ वैसा ही लेकिन अंजान सा था, मन ही मन बहुत खुशी का एहसास हुआ कि यह शहर अच्छा है सपनों की उड़ान भरने के लिए...जैसे भी करके यहीं रह लेंगे और खूब पढेंगे, यहां कोई मेरे हाथ से किताब नहीं छिनेगा..किताब का ख्याल आते ही उसने अपनी फटी गठरी खोला तो पैसे का बटुआ गायब,,, घबरा कर उसने किताब खोलना चाहा.... तो किसी ने पीछे से घसीट लिया..

अरे..अरे..यह..मेरी किताब....इतना ही कह पायी थी कि खींचने वाले सज्जन ने किताब से एक पेज फाड़ कर बेंच साफ करना शुरु कर दिया..

''मेरी किताब क्यों फाड़ दी??''
"बड़ी कीमती किताब थी?? भाग यहां से ... चली आई हैं किताब लेने..."

सहम कर आंखों में आंसू और फटी किताब लिए वह आगे बढ़ गयी..दहशत के मारे इतना नहीं बोल सकी.."मेरी किताब नहीं..मेरे सपने फाड़ दिए.."

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